Friday, August 16, 2013

पढ़े-लिखो का अनपढ़ भारत

युवाओं का देश कहे जाने वाले भारत में हर साल 30 लाख युवा स्नातक व स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करते हैं। इसके बावजूद देश में बेरोजगारी दिन दूनी-रात चौगुनी बढ़ रही है। 

सालाना बढ़ती शिक्षित बेरोजगारों की तादाद भारतीय शैक्षणिक पद्धति को सवालों के घेरे में खड़ा करती है, उस भारतीय शैक्षणिक पद्धति को जिसने भारतीयों को धर्म और अध्यात्म तो खूब सिखाया पर उसी भारत के युवाओं को उनकी काबिलियत सिद्ध करने का हुनर न सिखा सकी।

हाल ही में उच्च शिक्षा के लिए विश्व के ख्यात विश्वविद्यालयों, पाठ्यक्रमों, छात्रों व रोजगार के अवसरों पर हुए सर्वे ने भारतीय उच्च शिक्षा की वास्तविकता उजागर की है। इस सर्वे से साफ होता है कि आज भारत पढ़े-लिखो का अनपढ़ देश बन चुका है। हमारी तामझाम वाली उच्च शिक्षा हकीकत से कोसों दूर है, जबकि हम अपनी झूठी शान की तूती ही बजाते फिर रहे हैं।

हम अमेरिका, इंग्लैंड, चीन व जापान जैसे देशों की तुलना में कहीं भी खड़े दिखाई नहीं देते, जबकि इन देशों में छात्रों को न तो हाथ पकड़कर लिखना सिखाया जाता है और न ही वहां के पाठ्यक्रम भारत की तरह बेबुनियादी होते हैं।

इन देशों में प्रोफेशनल कोर्सों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है। बच्चों से लेकर युवाओं तक की बुनियादी पढ़ाई कम्प्यूटरों पर होती है जिससे वे कम्प्यूटर की दुनिया में महारत पा लेते हैं और अंग्रेजी उनकी पैतृक संपदा होने के कारण इन्हें कोई कठिनाई नहीं जाती।

परंतु इनकी तुलना में हमारा बुनियादी ढांचा बेहद कमजोर है। एक ओर जहां हम बच्चों को छठी-सातवीं से अंग्रेजी के ए, बी, सी, डी पढ़ाते हैं तो वहीं स्नातक स्तरों पर छात्रों को कम्प्यूटर की शिक्षा दी जाती है जिससे जाहिर है कि अमेरिका के बच्चे की अपेक्षा भारत का बच्चा पिछड़ा ही होगा।

उच्च शिक्षा के लिए सर्वे करने वाली संस्था एसोचैम ने भारतीय शिक्षा के साथ यहां के युवाओं को हर तरह से अयोग्य ठहराया है। संस्था का मानना है कि भारत में 85 फीसदी ऐसे शिक्षित युवा हैं, जो अच्छी-खासी पढ़ाई के बावजूद किसी भी परिस्थिति में अपनी योग्यता सिद्ध नहीं कर सकते। 47 फीसदी शिक्षित युवा रोजगार के लिए अयोग्य माने गए हैं, 65 फीसदी युवा क्लर्क का काम भी नहीं कर सकते और 97 फीसदी शिक्षित युवा अकाउंटिंग का काम सही तरीके से नहीं कर सकते।

देश में शिक्षा की गुणवत्ता का अंदाजा इसी आधार पर लगाया जा सकता है कि यहां इन्हीं शिक्षित युवाओं में से 90 फीसदी युवाओं से कामचलाऊ अंग्रेजी भी नहीं बनती। साथ ही एक दूसरी संस्था ने नौकरी-पेशा करने वाले युवाओं का सर्वे कर उनकी मासिक व सालाना आय पर अपनी रिपोर्ट पेश की।

इस रिपोर्ट में बताया गया कि देश का 58 फीसदी युवा बमुश्किल 65,000 रुपए सालाना कमा पाता है जबकि अधिकांश स्नातक छात्र देश के रोजगार कार्यक्रम मनरेगा की दर पर ही 6250 रुपए मासिक कमा लेते हैं, ऐसे में भारतीय शिक्षा से अच्छी मजदूरी कही जा सकती है, जो बिना लाखों खर्च किए पैसे तो देती है। भारत में एक ओर युवाओं को महाशक्ति माना गया लेकिन दूसरी ओर उसे बेरोजगारी व नाकामी की जंजीरों में भी जकड़ा गया है।

बहरहाल, युवाओं के लिए भारतीय उच्च शिक्षा पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी रहा कि देश में शिक्षा सुधार के लिए कोई उपाय नहीं किए गए। देश में 650 शैक्षणिक संस्थान व 33,000 से ज्यादा डिग्री देने वाले कॉलेज हैं लेकिन इनमें दशकों पुराने पाठ्यक्रमों का आज भी उपयोग किया जा रहा है।

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए न तो यूजीसी ही ध्यान दे पा रही है और न ही विश्वविद्यालयों का आला प्रशासन इस पर अपनी पकड़ बना पा रहा है, नतीजतन सारी की सारी घिसी-पिटी शिक्षा कॉलेजों के हवाले कर दी जाती है जिससे ये कॉलेज अपनी मनमानी कर पाठ्यक्रमों को निपटा देते हैं। यहां तक कि कॉलेज व विश्वविद्यालय छात्रों से मोटी-मोटी रकम लेकर उनकी फर्जी अंकसूची तक तैयार कर देते हैं जिससे जरूर कॉलेज व विश्वविद्यालयों का नाम रोशन होता है लेकिन छात्र को पर्याप्त ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता।

दूसरी सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि शैक्षणिक स्तर सुधारने के लिए आज तक कोई राष्ट्रीय समिति नहीं बनाई गई, जो राष्ट्रीय स्तर पर बैठक कर कोई बेहतर हल निकाल सके। यहां तक कि हमारी राजनीति में भी शिक्षा सुधार नीतियां नहीं बनाई गईं।

शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति का भी महत्वपूर्ण योगदान रहता है लेकिन भारत की असंवेदनशील राजनीति को आरोप-प्रत्यारोप के अलावा अन्य किसी विषय पर विचार करने का समय ही नहीं है।

देश में वैसे तो एक से बढ़कर एक संस्थान हैं, पर कोई भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि नहीं बना सका है और न ही छात्रों को उनकी का‍बिलियत सिद्ध करने का पूरा हौसला दे सके हैं। देश का एक इतना बड़ा तबका शिक्षित होते हुए भी आज बेरोजगार है, जो भारत की विकासशीलता में भी बाधा बना हुआ है। यहां बेरोजगारी की स्थिति किसी महामारी से कम नहीं है।

देश के शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने भी माना है कि देश में बढ़ती गरीबी युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी का ही नतीजा है। यदि भारत को आर्थिक मजबूती देनी है तो हमारे शासन को कहीं से भी भारतीय युवाओं को रोजगार मुहैया कराना होगा जिसके लिए सर्वप्रथम शिक्षा की गुणवत्ता बदलनी होगी।

स्कूली स्तर से ही अंग्रेजी व कम्प्यूटर का ज्ञान छात्रों को देना होगा, पाठ्यक्रमों को बदलना होगा व रोजगार के अवसरों पर भी ध्यान देना होगा। राजनीति में पार्टियों द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों व कार्यों में शिक्षा को दर्शाना होगा।

कुल मिलाकर सभी को शिक्षा के प्रति अपनी झूठी शान को हटाकर जमीनी स्तर पर कार्य करना होगा, तभी जाकर देश का इतना बड़ा तबका पूर्ण साक्षर होगा व उसे रोजगार के बेहतर अवसर भी प्राप्त होंगे।

कैसे साफ हुई जर्मनी की नदियां


कुछ ही साल पहले की बात है जब जर्मनी की नदियों में इतनी गंदगी थी कि इसमें रहने वाली मछलियां अल्सर से मर रही थीं। आज ये नदियां एकदम साफ हैं। क्या एल्बे नदी से दुनिया सीख ले सकती है?

पानी पर तैरता प्लास्टिक, सांस लेने बार-बार सतह पर आती अधमरी मछलियां। प्रदूषित पानी के कारण ऐसी स्थिति दुनिया के कई देशों में पैदा हो गई है। कुछ ही साल पहले तक जर्मनी की नदियों की भी यही हालत थी। लेकिन अब यहां मछलियां लौट आई हैं।

खासकर चेक गणराज्य से निकल कर हैम्बर्ग के आगे उत्तरी सागर में जाने वाली एल्बे नदी का पानी काफी प्रदूषित था। 1990 में जर्मनी के एकीकरण तक जीडीआर में नालियों का पानी सीधे एल्बे में डाल दिया जाता था।

जहरीला कॉकटेल : 1988 में शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि एल्बे से जहरीले तत्व समंदर में जा रहे हैं। इन जानलेवा रसायनों में 16,000 टन नाइट्रोजन, 10,000 टन फॉस्फोरस, 23 टन सीसा, और तीन अति जहरीला केमिकल कंपाउंड पेंटाक्लोरोफिनोल शामिल था।

हैम्बर्ग यूनिवर्सिटी के बायोलॉजिस्ट फाइट हेनिष ने डॉयचे वेले को इंटरव्यू में बताया, 'मछलियों के मुंह में गंभीर अल्सर हो गया था। इसे कॉलिफ्लावर अल्सर कहा जाता है। सांप जैसी दिखने वाली मछलियों की हालत भी खराब थी। छोटी मछलियों की त्वचा पर इन्फेक्शन हो गया था।'

फिर नदियां कैसे साफ की गई? पूर्वी जर्मनी में कई फैक्ट्रियां बंद हो गई। गंदा पानी लगातार साफ किया गया और एल्बे के आसपास कड़े पर्यावरण नियमों ने उसे बचा लिया। फाइट हेनिष के मुताबिक जर्मनी की बाकी नदियों के लिए भी ऐसा ही किया गया। अब मछली पकड़ने वालों और तैराकों के लिए एल्बे खुली है। इसमें तैरने से कोई खतरा नहीं। मछलियों सहित बाकी समुद्री जीव भी लौट रहे हैं। 2013 में एल्बे में 200 पॉरपॉइज मछलियां देखी गई। वसंत में ये मछलियां शिकार के लिए एल्बे में आती हैं। 

पुराने पाप : झीलों, तालाबों की तुलना में नदियों से प्रदूषण तेजी से समंदर में पहुंचता है। नदियां तो कुछ हद तक खुद को साफ कर लेती हैं, लेकिन समंदर में नुकसानदायक पदार्थ रह जाते हैं। हालांकि नदियों के तल में भी जहरीले पदार्थ जमा होते हैं। पिछले सालों में जर्मनी में आई बाढ़ के कारण ये जहरीले पदार्थ फिर से ऊपर आ सकते हैं और नदियों में पहुंच सकते हैं।

बाढ़ के कारण नदी की तलछट हिलती है और यह नदी के पानी की तुलना में ज्यादा दिन प्रदूषित रहती है।

टेक्निकल यूनिवर्सिटी हारबुर्ग हैम्बर्ग में वेस्ट वॉटर मैनेजमेंट एंड वॉटर प्रोटेक्शन इंस्टीट्यूट में पढ़ाने वाले श्टेफान कोएस्टर बताते हैं, 'बहुत पुरानी बात नहीं है जब पर्यावरण संरक्षण के नियम नहीं थे और इंसान प्रकृति का फायदा उठाता था। कोएस्टर कहते हैं कि नदियां खासतौर पर इंसानी लापरवाही का शिकार होती हैं। 'हमने देखा है कि हम पानी में कुछ भी डाल देते हैं। यह फिर तेजी से समंदर में चला जाता है। नजर से दूर तो दिमाग से भी दूर।'

आज शोधकर्ताओं का नजरिया बदल गया है। 'गंदे पानी को साफ करने के लिए ज्यादा से ज्यादा निवेश किया जा रहा है सिर्फ मेकेनिकल प्यूरिफिकेशन में नहीं लेकिन बायो केमिकल सफाई में भी।" साफ करने के तरीके भी बदले हैं। कोएस्टर कहते हैं, 'अब पोषक तत्वों को अलग कर लिया जाता है। नाइट्रोजन निकाली जाती है और फॉस्फोरस को हटा दिया जाता है।'

सफाई की प्रक्रिया : वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में पानी की सफाई बड़े से छोटे वाले नियम पर चलती है। पहले मेकेनिकल सफाई में बड़े आकार का कचरा अलग किया जाता है और फिर छोटे। फिर रेत अलग की जाती है क्योंकि इससे पंप को नुकसान हो सकता है।

सेटलिंग टैंक सुनिश्चित करता है कि पानी में घुले पदार्थों के अलावा सिर्फ बैक्टीरिया ही मौजूद हों। जर्मनी ने तो अपनी नदियां बचा ली लेकिन दुनिया के कई देशों में खासकर चीन और भारत में नदियां भारी प्रदूषण का शिकार हो रही हैं। क्या यूरोपीय तरीके से इन नदियों की सफाई की जा सकती है।

श्टेफान कोएस्टर काफी साल से चीन के साथ शोध में जुड़े हुए हैं। कोएस्टर का कहना है, 'चीन में पानी के मुद्दे पर कई मुश्किलें हैं जो सुलझाना जरूरी हैं।' नदियों की सुरक्षा के लिए नियम और कानून तो हैं लेकिन उन्हें अच्छे से लागू नहीं किया जाता। फाइट हेनिष कहते हैं कि एल्बे के मामले में भी काफी काम अभी होना है, जबकि नदी अब धीरे धीरे प्राकृतिक स्थिति में पहुंच रही है।

हेनिष जोर देते हैं, 'पानी की गुणवत्ता सिर्फ केमिकल तौर पर अच्छी हुई है। लेकिन नदी की संरचना और उसका हैबिटेट और खराब हुआ है।'

रिपोर्टः मार्क फॉन लुप्के/एएम 
संपादनः महेश झा