Friday, August 16, 2013

कैसे साफ हुई जर्मनी की नदियां


कुछ ही साल पहले की बात है जब जर्मनी की नदियों में इतनी गंदगी थी कि इसमें रहने वाली मछलियां अल्सर से मर रही थीं। आज ये नदियां एकदम साफ हैं। क्या एल्बे नदी से दुनिया सीख ले सकती है?

पानी पर तैरता प्लास्टिक, सांस लेने बार-बार सतह पर आती अधमरी मछलियां। प्रदूषित पानी के कारण ऐसी स्थिति दुनिया के कई देशों में पैदा हो गई है। कुछ ही साल पहले तक जर्मनी की नदियों की भी यही हालत थी। लेकिन अब यहां मछलियां लौट आई हैं।

खासकर चेक गणराज्य से निकल कर हैम्बर्ग के आगे उत्तरी सागर में जाने वाली एल्बे नदी का पानी काफी प्रदूषित था। 1990 में जर्मनी के एकीकरण तक जीडीआर में नालियों का पानी सीधे एल्बे में डाल दिया जाता था।

जहरीला कॉकटेल : 1988 में शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि एल्बे से जहरीले तत्व समंदर में जा रहे हैं। इन जानलेवा रसायनों में 16,000 टन नाइट्रोजन, 10,000 टन फॉस्फोरस, 23 टन सीसा, और तीन अति जहरीला केमिकल कंपाउंड पेंटाक्लोरोफिनोल शामिल था।

हैम्बर्ग यूनिवर्सिटी के बायोलॉजिस्ट फाइट हेनिष ने डॉयचे वेले को इंटरव्यू में बताया, 'मछलियों के मुंह में गंभीर अल्सर हो गया था। इसे कॉलिफ्लावर अल्सर कहा जाता है। सांप जैसी दिखने वाली मछलियों की हालत भी खराब थी। छोटी मछलियों की त्वचा पर इन्फेक्शन हो गया था।'

फिर नदियां कैसे साफ की गई? पूर्वी जर्मनी में कई फैक्ट्रियां बंद हो गई। गंदा पानी लगातार साफ किया गया और एल्बे के आसपास कड़े पर्यावरण नियमों ने उसे बचा लिया। फाइट हेनिष के मुताबिक जर्मनी की बाकी नदियों के लिए भी ऐसा ही किया गया। अब मछली पकड़ने वालों और तैराकों के लिए एल्बे खुली है। इसमें तैरने से कोई खतरा नहीं। मछलियों सहित बाकी समुद्री जीव भी लौट रहे हैं। 2013 में एल्बे में 200 पॉरपॉइज मछलियां देखी गई। वसंत में ये मछलियां शिकार के लिए एल्बे में आती हैं। 

पुराने पाप : झीलों, तालाबों की तुलना में नदियों से प्रदूषण तेजी से समंदर में पहुंचता है। नदियां तो कुछ हद तक खुद को साफ कर लेती हैं, लेकिन समंदर में नुकसानदायक पदार्थ रह जाते हैं। हालांकि नदियों के तल में भी जहरीले पदार्थ जमा होते हैं। पिछले सालों में जर्मनी में आई बाढ़ के कारण ये जहरीले पदार्थ फिर से ऊपर आ सकते हैं और नदियों में पहुंच सकते हैं।

बाढ़ के कारण नदी की तलछट हिलती है और यह नदी के पानी की तुलना में ज्यादा दिन प्रदूषित रहती है।

टेक्निकल यूनिवर्सिटी हारबुर्ग हैम्बर्ग में वेस्ट वॉटर मैनेजमेंट एंड वॉटर प्रोटेक्शन इंस्टीट्यूट में पढ़ाने वाले श्टेफान कोएस्टर बताते हैं, 'बहुत पुरानी बात नहीं है जब पर्यावरण संरक्षण के नियम नहीं थे और इंसान प्रकृति का फायदा उठाता था। कोएस्टर कहते हैं कि नदियां खासतौर पर इंसानी लापरवाही का शिकार होती हैं। 'हमने देखा है कि हम पानी में कुछ भी डाल देते हैं। यह फिर तेजी से समंदर में चला जाता है। नजर से दूर तो दिमाग से भी दूर।'

आज शोधकर्ताओं का नजरिया बदल गया है। 'गंदे पानी को साफ करने के लिए ज्यादा से ज्यादा निवेश किया जा रहा है सिर्फ मेकेनिकल प्यूरिफिकेशन में नहीं लेकिन बायो केमिकल सफाई में भी।" साफ करने के तरीके भी बदले हैं। कोएस्टर कहते हैं, 'अब पोषक तत्वों को अलग कर लिया जाता है। नाइट्रोजन निकाली जाती है और फॉस्फोरस को हटा दिया जाता है।'

सफाई की प्रक्रिया : वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में पानी की सफाई बड़े से छोटे वाले नियम पर चलती है। पहले मेकेनिकल सफाई में बड़े आकार का कचरा अलग किया जाता है और फिर छोटे। फिर रेत अलग की जाती है क्योंकि इससे पंप को नुकसान हो सकता है।

सेटलिंग टैंक सुनिश्चित करता है कि पानी में घुले पदार्थों के अलावा सिर्फ बैक्टीरिया ही मौजूद हों। जर्मनी ने तो अपनी नदियां बचा ली लेकिन दुनिया के कई देशों में खासकर चीन और भारत में नदियां भारी प्रदूषण का शिकार हो रही हैं। क्या यूरोपीय तरीके से इन नदियों की सफाई की जा सकती है।

श्टेफान कोएस्टर काफी साल से चीन के साथ शोध में जुड़े हुए हैं। कोएस्टर का कहना है, 'चीन में पानी के मुद्दे पर कई मुश्किलें हैं जो सुलझाना जरूरी हैं।' नदियों की सुरक्षा के लिए नियम और कानून तो हैं लेकिन उन्हें अच्छे से लागू नहीं किया जाता। फाइट हेनिष कहते हैं कि एल्बे के मामले में भी काफी काम अभी होना है, जबकि नदी अब धीरे धीरे प्राकृतिक स्थिति में पहुंच रही है।

हेनिष जोर देते हैं, 'पानी की गुणवत्ता सिर्फ केमिकल तौर पर अच्छी हुई है। लेकिन नदी की संरचना और उसका हैबिटेट और खराब हुआ है।'

रिपोर्टः मार्क फॉन लुप्के/एएम 
संपादनः महेश झा

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