गाजियाबाद: कोलकाता की एक अदालत में 178 वर्ष तक लटके मुकदमे की ओर इशारा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने यहां शनिवार को कहा कि भारत में देरी से होने वाले न्याय पर कोई चिंता नहीं है।
न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान ने कहा कि अमेरिका में एक मुकदमे का फैसला 27 साल बाद आने के बाद राष्ट्रीय बहस छिड़ गई थी। उन्होंने सवाल किया, ‘‘आखिर हम कब जागेंगे?’’
यहां नई सीबीआई अदालत परिसर का उद्घाटन करने के मौके पर न्यायमूर्ति चौहान ने तलाक के एक मुकदमे में आए फैसले का उदाहरण दिया और कहा कि जब फैसला आया तब पत्नी की उम्र 85 वर्ष और पति की उम्र 87 वर्ष हो चुकी थी। उन्होंने कोलकाता के पुराने मामले का ज्यादा ब्योरा नहीं दिया।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में विचारार्थ एक मुकदमे का उल्लेख किया। 1923 में प्रीवी काउंसिल के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। यह मामला आज भी आगरा की दीवानी अदालत में लंबित है।
उन्होंने कहा कि आतंकवादी एवं विध्वंसक गतिविधि (टाडा) अधिनियम को खत्म हुए कई साल हो गए, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में 22-23 वर्षों से इसके तहत दोषी ठहराए गए लोगों की अपील पर सुनवाई चल रही है।
एक और उदाहरण देते हुए न्यायमूर्ति चौहान ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय एक अपील पर सुनवाई कर रहा है जिसमें 35 वर्ष पहले सात लोगों को दोषी ठहराया गया था। सात में से एक निचली अदालत से बरी हो गया और पांच की मौत हो चुकी है। अब सर्वोच्च न्यायालय मामले में एक मात्र बचे 98 वर्षीय आरोपी की सुनवाई कर रहा है।
No comments:
Post a Comment